आंजनेय स्तुति (नमो आंजनेयं): पाठ, विधि व महत्व

श्री हनुमान भक्ति स्तुति

आंजनेय स्तुति – नमो आंजनेयं

आंजनेय स्तुति, जिसे इसके आरम्भिक शब्दों के कारण “नमो आंजनेयं” के नाम से भी जाना जाता है, भगवान हनुमान को समर्पित एक लोकप्रिय संस्कृत स्तुति है। इसमें हनुमानजी को आंजनेय, वायुपुत्र, मारुति, रामदूत, वज्रदेह और दिव्य तेज से सम्पन्न भक्त के रूप में नमन किया गया है।

यह स्तुति हनुमानजी के पराक्रम के साथ उनकी श्रीराम भक्ति, सेवा, ज्ञान, तेज और विनम्रता का भी स्मरण कराती है।

आंजनेय स्तुति की संक्षिप्त जानकारी

प्रचलित नाम
आंजनेय स्तुति या नमो आंजनेयं
आराध्य देव
भगवान हनुमान
भाषा
संस्कृत
मुख्य भाव
भक्ति, शक्ति, सेवा और साहस
उपयुक्त दिन
मंगलवार, शनिवार और हनुमान जयंती
पाठ का समय
प्रातः या सायंकालीन पूजा

आंजनेय स्तुति मूल पाठ

नीचे आंजनेय स्तुति का मूल पाठ दिया जा सकता है। अलग-अलग पुस्तकों और गायन-परम्पराओं में वर्तनी, पद-विभाजन अथवा उच्चारण में सामान्य अंतर मिल सकता है।

॥ आंजनेय स्तुति ॥

नमो आन्जनेयं नमो दिव्य कायम्
नमो वायुपुत्रं नमो सूर्य मित्रम् ।
नमो निखिल रक्शा करं रुद्र रूपम्
नमो मारुतिं रम दूतं नमामि ॥

नमो वानरेशं नमो दिव्य भासम्
नमो वज्र देहं नमो ब्रम्ह तेजम् ।
नमो शत्रु सम्हारकं वज्र कायम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

श्री आन्जनेयं नमस्ते प्रसन्नाजनेयं नमस्ते ॥

नमो वानरेंद्रं नमो विश्वपालम्
नमो विश्व मोदं नमो देव शूरम् ।
नमो गगन सन्चारितं पवन तनयम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

नमो रामदासं नमो भक्त पालम्
नमो ईश्व राम्शं नमो लोक वीरम् ।
नमो भक्त चिंता मणिं गधा पाणिम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

श्री आन्जनेयं नमस्ते प्रसन्नाजनेयं नमस्ते ॥

नमो पाप नाशं नमो सुप्र काशम्
नमो वेद सारं नमो निर्विकारम् ।
नमो निखिल संपूजितं देव स्रेश्तम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

नमो काम रूपं नमो रौद्र रूपम्
नमो वायु तनयं नमो वान राक्रम् ।
नमो भक्त वरदायकं आत्मवासम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

श्री आन्जनेयं नमस्ते प्रसन्नाजनेयं नमस्ते ॥

नमो रम्य नामं नमो भव पुनीतम्
नमो चिरन्जीवं नमो विश्व पूज्यम् ।
नमो शत्रु नाशन करं धीर रूपम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

नमो देव देवं नमो भक्त रत्नम्
नमो अभय वरदं नमो पंच वदनम् ।
नमो शुभद शुभ मंगलं आन्जनेयम्
नमो मारुतिं राम दूतं नमामि ॥

श्री आन्जनेयं नमस्ते प्रसन्नान्जनेयं नमस्ते ॥

॥ आंजनेय स्तुति सम्पूर्ण ॥

आंजनेय स्तुति का मुख्य भाव

इस स्तुति में हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों और गुणों का स्मरण किया जाता है। “आंजनेय” नाम उन्हें माता अंजना के पुत्र के रूप में सम्बोधित करता है, जबकि “वायुपुत्र” और “मारुति” उनके पवनदेव से सम्बन्ध को प्रकट करते हैं।

“रामदूत” नाम उनकी श्रीराम के प्रति पूर्ण निष्ठा, आज्ञापालन और सेवा का प्रतीक है। वज्रदेह, दिव्यकाय और ब्रह्मतेज जैसे सम्बोधन उनकी शक्ति, तेज और असाधारण सामर्थ्य का स्मरण कराते हैं।

स्तुति का केन्द्र केवल शारीरिक बल नहीं है। हनुमानजी का चरित्र यह सिखाता है कि वास्तविक शक्ति विनम्रता, विवेक, अनुशासन और धर्मपूर्ण सेवा के साथ ही कल्याणकारी बनती है।

स्तुति में स्मरण किए गए हनुमानजी के स्वरूप

आंजनेय
वायुपुत्र
मारुति
रामदूत
वानरेश
वज्रदेह
रुद्ररूप
सूर्यमित्र
पवनतनय

आंजनेय स्तुति पाठ विधि

1. पूजा स्थान स्वच्छ करें

हनुमानजी का चित्र या प्रतिमा स्वच्छ और ऊँचे स्थान पर रखें।

2. दीप प्रज्वलित करें

सुरक्षित रूप से घी या तेल का दीपक जलाकर पुष्प अर्पित करें।

3. श्रीराम का स्मरण करें

पाठ से पहले श्रीराम, माता सीता और हनुमानजी का ध्यान करें।

4. स्पष्ट उच्चारण से पाठ करें

जल्दबाजी न करें। कठिन संस्कृत शब्दों को पहले धीरे-धीरे पढ़ें।

आंजनेय स्तुति पाठ का पारम्परिक महत्व

भक्ति-परम्परा में इस स्तुति का पाठ साहस, आत्मविश्वास, एकाग्रता और हनुमानजी के प्रति श्रद्धा बढ़ाने के उद्देश्य से किया जाता है। इसके नामों का स्मरण भक्त को शक्ति के साथ सेवा और विनम्रता का महत्व याद दिलाता है।

ऐसे आध्यात्मिक लाभ आस्था और परम्परा से जुड़े हैं। स्तुति का पाठ किसी रोग, संकट, परीक्षा, कानूनी समस्या या आर्थिक सफलता के निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं है।

हनुमानजी के अन्य प्रमुख पाठ

आंजनेय स्तुति से जुड़े सामान्य प्रश्न

1. आंजनेय स्तुति किस देवता को समर्पित है?

यह स्तुति माता अंजना के पुत्र भगवान हनुमान को समर्पित है।

2. क्या इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है?

हाँ, श्रद्धालु इसे दैनिक पूजा में अथवा मंगलवार और शनिवार को पढ़ सकते हैं।

3. पाठ कितनी बार करना चाहिए?

एक बार किया गया एकाग्र पाठ भी पर्याप्त है। निर्धारित संख्या परिवार या गुरु-परम्परा के अनुसार रखी जा सकती है।

4. गलत उच्चारण होने पर क्या करें?

पहले छोटे भागों में अभ्यास करें, विश्वसनीय पाठ देखकर पढ़ें और आवश्यकता होने पर संस्कृत जानने वाले शिक्षक से मार्गदर्शन लें।

भक्ति संबंधी सूचना:
आंजनेय स्तुति के पाठ, वर्तनी और गायन शैली में क्षेत्रीय अंतर हो सकते हैं। पाठ करते समय अपने परिवार, मंदिर अथवा मान्य धार्मिक परम्परा का अनुसरण किया जा सकता है।