हनुमान बाहुक | Hanuman Bahuk in Hindi Lyrics

हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित भगवान हनुमान जी की एक अत्यंत प्रभावशाली स्तुति मानी जाती है। इस पाठ में भक्त हनुमान जी से रोग, पीड़ा, भय, संकट और मानसिक कष्टों से रक्षा की प्रार्थना करता है।

इस पेज पर आपको हनुमान बाहुक का संपूर्ण पाठ, सरल हिंदी अर्थ, पाठ विधि, पारंपरिक लाभ, PDF/MP3 guidance और इससे जुड़े सामान्य प्रश्न मिलेंगे।

हनुमान बाहुक संपूर्ण पाठ

नीचे हनुमान बाहुक का पूरा पाठ दिया गया है। भक्त इसे मंगलवार, शनिवार, हनुमान जयंती या किसी भी शारीरिक/मानसिक कष्ट के समय श्रद्धा से पढ़ सकते हैं।

Hanuman Bahuk Hindi Lyrics

हनुमान बाहुक

छप्पय

सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु ।

भुज बिसाल, मूरति कराल कालहु को काल जनु ॥

गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।

जातुधान-बलवान मान-मद-दवन पवनसुव ॥

कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।

गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत समन सकल-संकट-विकट ॥१॥

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रवि तरुन तेज घन ।

उर विसाल भुज दण्ड चण्ड नख-वज्रतन ॥

पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।

कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन ॥

कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति विकट ।

संताप पाप तेहि पुरुष पहि सपनेहुँ नहिं आवत निकट ॥२॥

झूलना

पञ्चमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो ।

बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ॥

जासु गुनगाथ रघुनाथ कह जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो ।

दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ॥३॥

घनाक्षरी

भानुसों पढ़न हनुमान गए भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो ।

पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो ॥

कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो।

बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो ॥४॥

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।

कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥

बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूतें घाटि नभ तल भो ।

नाई-नाई-माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ॥५॥

गो-पद पयोधि करि, होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निःसंक पर पुर गल बल भो ।

द्रोन सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ॥

संकट समाज असमंजस भो राम राज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।

साहसी समत्थ तुलसी को नाई जा की बाँह, लोक पाल पालन को फिर थिर थल भो ॥६॥

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।

जातुधान दावन परावन को दुर्ग भयो, महा मीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥

कुम्भकरन रावन पयोद नाद ईधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।

भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ॥७॥

दूत राम राय को सपूत पूत पौनको तू, अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।

सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन लखन प्रिय प्राण सो ॥

दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।

ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ॥८॥

दवन दुवन दल भुवन बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदी छोर को ।

पाप ताप तिमिर तुहिन निघटन पटु, सेवक सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥

लोक परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।

राम को दुलारो दास बामदेव को निवास। नाम कलि कामतरु केसरी किसोर को ॥९॥

महाबल सीम महा भीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।

कुलिस कठोर तनु जोर परै रोर रन, करुना कलित मन धारमिक धीर को ॥

दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरन हार तुलसी की पीर को ।

सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ॥१०॥

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि हर, मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।

धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु पोषिबे को हिम भानु भो ॥

खल दुःख दोषिबे को, जन परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक दुदान भो ।

आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ॥११॥

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।

देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ॥

जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।

सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ॥१२॥

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।

लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥

केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।

बालक ज्यों पालि हैं कृपालु मुनि सिद्धता को, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ॥१३॥

करुनानिधान बलबुद्धि के निधान हौ, महिमा निधान गुनज्ञान के निधान हौ ।

बाम देव रुप भूप राम के सनेही, नाम, लेत देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥

आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक बेद बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।

मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥१४॥

मन को अगम तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।

देवबंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।

बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।

बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ॥१५॥

सवैया

जान सिरोमनि हो हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।

ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥

साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।

दोष सुनाये तैं आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो ॥१६॥

तेरे थपै उथपै न महेस, थपै थिर को कपि जे उर घाले ।

तेरे निबाजे गरीब निबाज बिराजत बैरिन के उर साले ॥

संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।

बूढ भये बलि मेरिहिं बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥१७॥

सिंधु तरे बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवासे ।

तैं रनि केहरि केहरि के बिदले अरि कुंजर छैल छवासे ॥

तोसो समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।

बानरबाज ! बढ़े खल खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवासे ॥१८॥

अच्छ विमर्दन कानन भानि दसानन आनन भा न निहारो ।

बारिदनाद अकंपन कुंभकरन से कुञ्जर केहरि वारो ॥

राम प्रताप हुतासन, कच्छ, विपच्छ, समीर समीर दुलारो ।

पाप ते साप ते ताप तिहूँ तें सदा तुलसी कह सो रखवारो ॥१९॥

घनाक्षरी

जानत जहान हनुमान को निवाज्यो जन, मन अनुमानि बलि बोल न बिसारिये ।

सेवा जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ॥

अपराधी जानि कीजै सासति सहस भान्ति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।

साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥२०॥

बालक बिलोकि, बलि बारें तें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।

रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो विचारिये ॥

बड़ो बिकराल कलि काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को निहारि सो निबारिये ।

केसरी किसोर रनरोर बरजोर बीर, बाँह पीर राहु मातु ज्यौं पछारि मारिये ॥२१॥

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो संबारिये ।

राम के गुलामनि को काम तरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥

साहेब समर्थ तो सों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।

पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यों पकरि के बदन बिदारिये ॥२२॥

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।

मुद मरकट रोग बारिनिधि हेरि हारे, जीव जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥

कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै विचारिये ।

महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात घात ही मरोरि मारिये ॥२३॥

लोक परलोकहुँ तिलोक न विलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।

कर्म, काल, लोकपाल, अग जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥

खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो, देव दुखी देखिअत भारिये ।

बात तरुमूल बाँहूसूल कपिकच्छु बेलि, उपजी सकेलि कपि केलि ही उखारिये ॥२४॥

करम कराल कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बक भगिनी काहू तें कहा डरैगी ।

बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहू बल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥

आई है बनाई बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सब को गुनी के पाले परैगी ।

पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपि कान्ह तुलसी की, बाँह पीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ॥२५॥

भाल की कि काल की कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।

करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ॥

पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।

आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ॥२६॥

सिंहिका सँहारि बल सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।

लंक परजारि मकरी बिदारि बार बार, जातुधान धारि धूरि धानी करि डारी है ॥

तोरि जमकातरि मंदोदरी कठोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।

भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ॥२७॥

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र रवि राहु की ।

तेरी बाँह बसत बिसोक लोक पाल सब, तेरो नाम लेत रहैं आरति न काहु की ॥

साम दाम भेद विधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।

आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ॥२८॥

टूकनि को घर घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नत पाल पालि पोसो है ।

कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥

इतनो परेखो सब भान्ति समरथ आजु, कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।

सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि कोसो है ॥२९॥

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।

औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधीकाति है ॥

करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।

चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ॥३०॥

दूत राम राय को, सपूत पूत वाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।

बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के धाय को ॥

एते बडे साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।

थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ॥३१॥

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।

पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाग, राम दूत की रजाई माथे मानि लेत हैं ॥

घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।

क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥३२॥

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर घर के ।

तेरे बल राम राज किये सब सुर काज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥

तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरिहर के ।

तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीस नाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ॥३३॥

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।

भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनो न अव डेरिये ॥

अँबु तू हौं अँबु चूर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।

बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ॥३४॥

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।

बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम मूल मलिनाई है ॥

करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूंकि फौंजै ते उड़ाई है ।

खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ॥३५॥

सवैया

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।

पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥

बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।

श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ॥३६॥

घनाक्षरी

काल की करालता करम कठिनाई कीधौ, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।

बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ॥

लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।

भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ॥३७॥

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुंह पीर, जर जर सकल पीर मई है ।

देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ॥

हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारे हीतें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।

कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ॥३८॥

बाहुक सुबाहु नीच लीचर मरीच मिलि, मुँह पीर केतुजा कुरोग जातुधान है ।

राम नाम जप जाग कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ॥

सुमिरे सहाय राम लखन आखर दौऊ, जिनके समूह साके जागत जहान है ।

तुलसी सँभारि ताडका सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाई बानवान है ॥३९॥

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूक टाक हौं ।

परयो लोक रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ॥

खोटे खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।

तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥४०॥

असन बसन हीन बिषम बिषाद लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।

तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥

नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।

ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ॥४१॥

जीओ जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुर सरि को ।

तुलसी के दोहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँऊ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ॥

मो को झूँटो साँचो लोग राम कौ कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।

भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ॥४२॥

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।

मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ॥

ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि की जै तुलसी को जानि जन फुर कै ।

कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ॥४३॥

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।

हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ॥

माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहें साँची मन गुनिये ।

तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहिं, हौं हूँ रहों मौनही वयो सो जानि लुनिये ॥४४॥

 

विषय सूची

  • हनुमान बाहुक क्या है?
  • हनुमान बाहुक नाम का अर्थ
  • हनुमान बाहुक की संक्षिप्त जानकारी
  • हनुमान बाहुक का स्रोत और रचनाकार
  • हनुमान बाहुक का संपूर्ण भावार्थ
  • हनुमान बाहुक की मुख्य आध्यात्मिक शिक्षाएं
  • हनुमान बाहुक कैसे पढ़ें?
  • हनुमान बाहुक कब पढ़ना चाहिए?
  • हनुमान बाहुक के पारंपरिक लाभ
  • हनुमान बाहुक PDF और MP3
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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हनुमान बाहुक क्या है?

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान जी को समर्पित एक भक्तिपूर्ण स्तुति है। इसमें हनुमान जी के बल, भक्ति, करुणा, रोग-निवारक स्वरूप और संकटमोचन महिमा का वर्णन मिलता है।

यह पाठ विशेष रूप से शारीरिक पीड़ा, रोग, हाथ-पैर या शरीर के कष्ट, भय, मानसिक अशांति और जीवन की बाधाओं से मुक्ति के लिए श्रद्धा से पढ़ा जाता है।

हनुमान बाहुक में भक्त हनुमान जी से विनती करता है कि हे पवनपुत्र, आप श्रीराम के परम सेवक हैं और अपने भक्तों के संकट दूर करने वाले हैं। कृपा करके मेरे रोग, पीड़ा, भय और कष्टों को दूर करें।

हनुमान बाहुक नाम का अर्थ

शब्दसरल अर्थ
हनुमानभगवान श्रीराम के परम भक्त, पवनपुत्र और संकटमोचन
बाहुभुजा, हाथ या शरीर की शक्ति से जुड़ा भाव
बाहुकभुजा/शरीर की पीड़ा से मुक्ति की प्रार्थना के भाव से जुड़ा पाठ

इस प्रकार हनुमान बाहुक का भाव है वह स्तुति जिसमें भक्त भगवान हनुमान जी से शरीर, मन और जीवन के कष्टों से रक्षा की प्रार्थना करता है।

हनुमान बाहुक की संक्षिप्त जानकारी

विषयविवरण
पाठ का नामहनुमान बाहुक
आराध्य देवभगवान हनुमान जी
पारंपरिक रचनाकारगोस्वामी तुलसीदास जी
मुख्य भावरोग, पीड़ा, भय और संकट से रक्षा की प्रार्थना
कब पढ़ते हैं?मंगलवार, शनिवार, हनुमान जयंती या कष्ट के समय
कौन पढ़ सकता है?कोई भी श्रद्धालु भक्त

हनुमान बाहुक का स्रोत और पारंपरिक रचनाकार

हनुमान बाहुक को भक्ति-परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना माना जाता है। तुलसीदास जी रामभक्ति परंपरा के महान संत-कवि हैं और हनुमान जी के प्रति उनकी भक्ति अत्यंत प्रसिद्ध है।

लोक-मान्यता के अनुसार, जब तुलसीदास जी को शरीर और विशेष रूप से बाहु/भुजा में अत्यधिक पीड़ा हुई, तब उन्होंने हनुमान जी की शरण लेकर यह स्तुति की। इसलिए यह पाठ रोग, पीड़ा और कष्ट से मुक्ति की प्रार्थना के रूप में बहुत श्रद्धा से पढ़ा जाता है।

यह पाठ केवल शारीरिक कष्टों के लिए ही नहीं, बल्कि मन की कमजोरी, भय, निराशा और जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी हनुमान जी की कृपा पाने के लिए किया जाता है।

हनुमान बाहुक का संपूर्ण भावार्थ

हनुमान बाहुक का मुख्य भाव भगवान हनुमान जी की शरणागति है। इसमें भक्त हनुमान जी से कहता है कि आप श्रीराम के प्रिय सेवक, पवनपुत्र, महाबली, दयालु और भक्तों के रक्षक हैं।

इस पाठ में हनुमान जी के पराक्रम, उनके दिव्य स्वरूप, उनकी सेवा-भावना और संकट दूर करने वाली शक्ति का वर्णन है। भक्त अपने शरीर और मन की पीड़ा को हनुमान जी के सामने रखकर उनसे कृपा, साहस और रक्षा की प्रार्थना करता है।

हनुमान बाहुक हमें यह सिखाता है कि जब मनुष्य अपने बल से किसी समस्या को हल नहीं कर पाता, तब ईश्वर-भक्ति, श्रद्धा, प्रार्थना और धैर्य उसे आंतरिक शक्ति देते हैं।

हनुमान बाहुक की मुख्य आध्यात्मिक शिक्षाएं

भक्ति में सच्ची शरणागति जरूरी है

हनुमान बाहुक में भक्त अपने कष्ट को छिपाता नहीं है, बल्कि विनम्र भाव से हनुमान जी के सामने रखता है। इससे हमें सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि सरलता और शरणागति होती है।

हनुमान जी बल और करुणा दोनों के प्रतीक हैं

हनुमान जी केवल वीरता के देवता नहीं हैं। वे दया, सेवा, रक्षा और भक्त-कल्याण के भी प्रतीक हैं। जो भक्त श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, उसे मनोबल और आश्रय मिलता है।

कष्ट के समय धैर्य और विश्वास रखें

जीवन में रोग, पीड़ा या परेशानी आने पर मनुष्य घबरा जाता है। हनुमान बाहुक यह संदेश देता है कि संकट के समय हनुमान जी का स्मरण मन को स्थिर करता है और भक्त को साहस देता है।

हनुमान बाहुक कैसे पढ़ें?

हनुमान बाहुक का पाठ श्रद्धा, शुद्ध भावना और शांत मन से करना चाहिए। पाठ करते समय मन में भगवान हनुमान जी और श्रीराम जी का स्मरण रखना शुभ माना जाता है।

सरल पाठ विधि

  • सुबह या शाम स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • हनुमान जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक जलाएं।
  • हनुमान जी को सिंदूर, लाल फूल, गुड़-चना या बूंदी का प्रसाद अर्पित करें।
  • सबसे पहले ॐ हनुमते नमः मंत्र का 11 बार जाप करें।
  • इसके बाद शांत मन से हनुमान बाहुक का पाठ करें।
  • पाठ के अंत में हनुमान जी से रोग, भय, बाधा और कष्टों से रक्षा की प्रार्थना करें।

हनुमान बाहुक कब पढ़ना चाहिए?

हनुमान बाहुक का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

इसे इन स्थितियों में पढ़ना लाभकारी माना जाता है:

  • शारीरिक पीड़ा या रोग के समय
  • हाथ, पैर, शरीर या नसों की तकलीफ में
  • भय, चिंता या मानसिक अशांति के समय
  • बार-बार बाधा आने पर
  • नकारात्मक ऊर्जा या डर महसूस होने पर
  • मंगलवार और शनिवार की हनुमान पूजा में
  • हनुमान जयंती या विशेष अनुष्ठान में

हनुमान बाहुक के पारंपरिक लाभ

1. रोग और पीड़ा से राहत की प्रार्थना

हनुमान बाहुक को पारंपरिक रूप से रोग, शारीरिक पीड़ा और विशेष रूप से बाहु/भुजा की तकलीफ में पढ़ा जाता है। यह पाठ भक्त को मानसिक शक्ति और ईश्वर पर विश्वास देता है।

2. भय और चिंता से मुक्ति

हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है। उनके स्मरण से भक्त के मन में साहस, निडरता और सकारात्मकता आती है।

3. मनोबल और आत्मविश्वास में वृद्धि

जब व्यक्ति कष्ट में होता है, तब मन कमजोर होने लगता है। हनुमान बाहुक का पाठ मन को संभालता है और भक्त को धैर्य देता है।

4. नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा

श्रद्धा से किया गया हनुमान जी का पाठ घर और मन के वातावरण को सकारात्मक बनाता है। इसलिए भक्त इसे बाधा, भय और नकारात्मक विचारों से रक्षा के लिए पढ़ते हैं।

5. श्रीराम भक्ति में वृद्धि

हनुमान जी की भक्ति का मूल श्रीराम सेवा है। हनुमान बाहुक का पाठ भक्त को हनुमान जी के माध्यम से श्रीराम भक्ति की ओर ले जाता है।

क्या हनुमान बाहुक रोगों का इलाज है?

हनुमान बाहुक एक भक्तिपूर्ण और आध्यात्मिक पाठ है। इसे श्रद्धा, मानसिक शांति और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने के लिए पढ़ा जाता है। यदि किसी व्यक्ति को गंभीर शारीरिक समस्या, रोग या दर्द है, तो उसे डॉक्टर की सलाह और चिकित्सा अवश्य लेनी चाहिए।

भक्ति और चिकित्सा दोनों अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। हनुमान बाहुक का पाठ मन को शक्ति देता है, लेकिन इसे चिकित्सा का विकल्प नहीं मानना चाहिए।

हनुमान बाहुक और हनुमान चालीसा में अंतर

विषयहनुमान बाहुकहनुमान चालीसा
मुख्य भावरोग, पीड़ा और कष्ट से मुक्ति की प्रार्थनाहनुमान जी की महिमा, शक्ति और कृपा का वर्णन
रचनाकारगोस्वामी तुलसीदास जीगोस्वामी तुलसीदास जी
पाठ का उपयोगकष्ट, रोग या विशेष प्रार्थना मेंदैनिक पाठ, भक्ति और संकटमोचन स्मरण में
आराध्य देवभगवान हनुमान जीभगवान हनुमान जी

हनुमान बाहुक PDF और MP3

आप नीचे दिए गए विकल्प से हनुमान बाहुक PDF डाउनलोड कर सकते हैं या पाठ को प्रिंट कर सकते हैं। भक्त इसे मोबाइल में सेव करके दैनिक पाठ, मंगलवार/शनिवार की पूजा या विशेष अनुष्ठान में पढ़ सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हनुमान बाहुक किसने लिखा है?

हनुमान बाहुक को परंपरागत रूप से गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना माना जाता है।

हनुमान बाहुक किस देवता को समर्पित है?

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान जी को समर्पित है। इसमें भक्त हनुमान जी से रोग, भय, पीड़ा और संकटों से रक्षा की प्रार्थना करता है।

हनुमान बाहुक कब पढ़ना चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ सकते हैं, लेकिन मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। कष्ट, रोग, भय या मानसिक अशांति के समय भी इसका पाठ किया जाता है।

क्या हनुमान बाहुक रोज पढ़ सकते हैं?

हाँ, श्रद्धा और शुद्ध भावना से हनुमान बाहुक का रोज पाठ किया जा सकता है। यदि रोज संभव न हो तो मंगलवार और शनिवार को पढ़ना अच्छा माना जाता है।

हनुमान बाहुक पढ़ने से क्या लाभ होता है?

पारंपरिक मान्यता के अनुसार, हनुमान बाहुक का पाठ रोग, पीड़ा, भय, बाधा, मानसिक अशांति और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा की प्रार्थना के लिए किया जाता है।

क्या हनुमान बाहुक चिकित्सा का विकल्प है?

नहीं। हनुमान बाहुक एक आध्यात्मिक और भक्तिपूर्ण पाठ है। किसी भी रोग या दर्द में डॉक्टर की सलाह और सही इलाज अवश्य लेना चाहिए।

हनुमान बाहुक और हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?

हनुमान चालीसा हनुमान जी की महिमा और कृपा का सामान्य भक्तिपूर्ण पाठ है, जबकि हनुमान बाहुक विशेष रूप से रोग, पीड़ा और कष्ट निवारण की प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है।

निष्कर्ष

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान जी की कृपा, रक्षा और संकटमोचन स्वरूप का स्मरण कराने वाला शक्तिशाली भक्तिपूर्ण पाठ है। यह पाठ भक्त को रोग, पीड़ा, भय और मानसिक अशांति के समय धैर्य, विश्वास और आंतरिक शक्ति देता है।

जो भक्त श्रद्धा, विश्वास और विनम्र भाव से हनुमान जी का स्मरण करता है, उसे जीवन की कठिन परिस्थितियों में साहस, शांति और श्रीराम भक्ति की प्रेरणा मिलती है।

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